महाशिवरात्रिः अज्ञान के अंधकार से परमात्मा के प्रकाश की ओर यात्रा

    ब्रह्मा कुमारीज़ – बर्लिंग्टन – अंतरमन का स्वर्णिम प्रभात किरण

    अंतरमन का स्वर्णिम प्रभात किरण

    महाशिवरात्रिः अज्ञान के अंधकार से परमात्मा के प्रकाश की ओर यात्रा

    एक क्षणभर ठहरिए। एक गहरी श्वास लीजिए।

    कल्पना कीजिए कि आप मध्यरात्रि के घनघोर अंधकार में एक विशाल सागर के तट पर खड़े हैं। चारों ओर *अति मीठी* शांति है। आकाश अमावस्या की रात्रि-सा है, फिर भी क्षितिज पर कुछ हलचल-सी होने लगती है। धीरे- धीरे, अत्यंत कोमलता के साथ, स्वर्णिम किरणें फूटने लगती हैं। प्रभात का उदय हो रहा है। उस प्रकाश के साथ आपके भीतर एक शांत आशा जन्म लेती है-नवसृजन की आशा, अपने श्रेष्ठ स्वरूप की आशा और एक शांतिमय विश्व की आशा।

    महाशिवरात्रि हमें इसी आंतरिक अनुभूति का आमंत्रण देती है।

    शिव-जो *सदा* कल्याणकारी हैं-केवल पूजन के लिए कोई स्थूल रूप नहीं, बल्कि चैतन्य प्रकाश का निराकार बिंदु हैं, ‘ज्योतिबिंदु’ हैं। वे *परमात्मा* हैं, जो नई सृष्टि के रचयिता, परिवर्तन और परिवर्तन करते हैं। संपूर्ण भारतवर्ष और विश्वभर में शिव को शुद्ध प्रेम, गहन आदर और अटल श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। जब शिवरात्रि आती है, तो भक्त उपवास रखते हैं, मंत्रोच्चार करते हैं, प्रार्थनाएँ अर्पित करते हैं और आनंद में मग्न हो उठते हैं। किंतु इन बाह्य धार्मिक विधियों के परे एक गहन आंतरिक संदेश *समाया हुवा हैं*।

    जैसे हम शिवरात्रि के लिए बाह्य तैयारी करते हैं, वैसे ही आइए, अपने ध्यान को अंतर्मुख करें। *शिवरात्रि के आध्यात्मिक अर्थ को समझे*

    आज विश्वभर में मानव आत्माएँ मौन रूप से कुछ खोती जा रही हैं-शांति, स्पष्टता, आत्म-सम्मान और जीवन के उद्देश्य का बोध। अज्ञान, दुःख, अस्वीकृति, आंतरिक संघर्ष और निराशा आधुनिक जीवन पर हावी हो रहे हैं। क्या वास्तव में जीवन का उ‌द्देश्य यही था? और यदि नहीं, तो इस घनघोर अंधकार में प्रकाश कैसे लाया जाए?

    शिवरात्रि उस दिव्य क्षण का प्रतीक है, जब निराकार *परमपिता* परमात्मा शिव आध्यात्मिक रात्रि के समय इस धरती पर अवतरित होते हैं। यहाँ ‘रात्रि’ केवल भौतिक अंधकार का संकेत नहीं, बल्कि अज्ञान के गहन अंधकार-सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान और धर्म के अभाव का अंधकार  है।

    शिवरात्रि को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि ‘हम कौन हैं’।

    पाँच तत्वों से बने इस शरीर में रहते हुए, नाम, व्यवसाय, संस्कृति, जाति और संबंधों के लेबलों के नीचे हमने अपनी वास्तविक पहचान भुला दी है। वास्तव में हम अविनाशी, अमर प्रकाश के पुंज हैं-इस शरीर में निवास करने वाली आत्माएँ हैं। *हम भी परमात्मा की तरह एक ज्योति बिंदु आत्मा हैं।* हम दुर्बल या असहाय नहीं; हम अपनी इंद्रियों के *मालिक* हैं। मूलतः प्रत्येक आत्मा समान है-शांति, शक्ति, पवित्रता, प्रेम और सत्य से परिपूर्ण। हम सभी उस एक निराकार पिता, परम ज्योति की संतान हैं।

    ईश्वर की संतान होने के नाते, उनके गुण हमारे भीतर निहित हैं। इस विश्वमंच पर हमारी यात्रा के आरंभ में हम संपन्न, गुणों से भरपूर, चमकते हीरे समान थे। जैसे एक अभिनेता अपनी भूमिका निभाने के लिए वेश धारण करता है, वैसे ही आत्मा इस शाश्वत नाटक में अपनी भूमिका निभाने हेतु शरीर का आधार लेती है। इस यात्रा के प्रारंभिक अध्यायों में हम पूर्ण *आत्म अभिमानी स्थिति* के साथ जीते थे। हमारे कर्मों में हमारा मूल धर्म-शांति और पवित्रता-*स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।* तब हमारे भीतर और हमारे आसपास के संसार में पूर्ण *स्नेह और सम्मान* था।

    परंतु संसार में कुछ भी सदा नया नहीं रहता। परिवर्तन इस जगत का नियम है। जैसे-जैसे हम अपनी भूमिकाएँ निभाते गए, वैसे-वैसे हम *आत्मायें* सीढ़ी से धीरे-धीरे नीचे उतरते गए। आसक्ति, लोभ, अहंकार, क्रोध और वासनाएँ हमारे कर्मों को प्रभावित करने लगीं। आत्मा का मूल धर्म भूमिकाओं, उत्तरदायित्वों और अपेक्षाओं की परतों के नीचे दब गया। इस प्रकार जीवन में अंधकार का प्रवेश हुआ-शून्यता का अंधकार।

      और प्रत्येक आत्मा के गहन अंतर में उस शुद्ध, स्वर्णिम और निर्दोष अवस्था में लौटने की एक मौन आकांक्षा जन्म लेने लगी।

      ऐसे अंधकार के समय में परम पिता शिव मानवता को उसकी सर्वोच्च क्षमता पर पुनः स्थापित करने आते हैं। *यह पुरुषोत्तम श्रेष्ठ ‘संगम युग’ है-पुराने और नए के बीच का मिलन काल। यह कल्याणकारी* समय है, जब परमात्मा आत्मा के भीतर सत्य का दीप प्रज्वलित करते हैं। शिव सभी आत्माओं के लिए *’शिवालय’ – संपूर्ण सुख, शांति, प्रेम, नई दुनिया की स्थापना करते हैं।*

      जब हम आत्म-स्मृति के साथ अपना दैनिक जीवन जीना आरंभ करते हैं, तो कुछ बदलने लगता है। भीतर हल्कापन और स्वतंत्रता का अनुभव होता है। बाह्य दबावों और आंतरिक तृष्णाओं का प्रभाव क्षीण होने लगता है। इस अवस्था में हम स्वाभाविक रूप से परम स्रोत-आध्यात्मिक ऊर्जा के महास्रोत से जुड़े रहते हैं। *स्वयं को आत्मा समज परमात्मा को याद करने से, आत्मा पुनः पवन बनती हैं ।* यह दिव्य संबंध आत्मा को सशक्त करता है और स्व-राज्य को पुनः प्राप्त करने में सहायक होता है। मन हमारे वश में आने लगता है। हम स्पष्टता और श्रेष्ठ उद्देश्य के साथ सोचने, अनुभव करने और कर्म करने लगते हैं।

      पुराने बोझ पिघलने लगते हैं। आंतरिक बंधन शिथिल हो जाते हैं। संबंधों में मधुरता आ जाती है। स्वयं से, परम पिता से और एक-दूसरे से हमारा संबंध शुद्ध और प्रामाणिक बनता है।

      जब आत्माएँ उस ‘एक’ के प्रेम और स्मरण में एकत्र होती हैं, तब स्वर्ग का अवतरण आरंभ होता है-कहीं दूर नहीं, बल्कि हर घर और हर हृदय में।

      इस महाशिवरात्रि पर आइए, अपने भीतर के स्वर्णिम प्रभात को जाग्रत करें। आइए, परमात्मा के इस महान कार्य को और इस दिव्य परिवर्तन में अपनी भूमिका को सच्चे अर्थों में समझें।

      आपको 12 ज्योतिर्लिंगों के ‘महादर्शन’ के माध्यम से इस गहन ज्ञान का अनुभव करने के लिए हार्दिक आमंत्रण है। यहाँ आपको अपने जीवन में और संपूर्ण मानवता में शिव की भूमिका को पहचानने का अवसर मिलेगा-उस स्वर्णिम प्रभात की ओर एक कदम, जिसकी खोज हम सभी सदियों से करते आ रहे हैं।

      ब्रह्मा कुमारीज़ – बर्लिंग्टन
      5100, यूनिट 57, साउथ सर्विस रोड, बर्लिंग्टन, ON
      📞 905-633-9494
      ✉️ burlington@ca.brahmakumaris.org

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